भगवद्गीता: अध्याय-2, श्लोक 20

भगवद्गीता: अध्याय-2, श्लोक 20

नवंबर 25, 2024 - 12:28
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भगवद्गीता: अध्याय-2, श्लोक 20

भगवद्गीता: अध्याय-2, श्लोक 20

न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो-
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥2.20॥
 
न जायते ( न जन्मता है never takes birth) म्रियते (मरता है dies) वा (तथा यह either) कदाचित् (कभी at any time) न अयम् (न यह never this)भूत्वा (उत्पन्न होकर having born) भविता( होने वाला नहीं है will come to be) वा न भूयः (न ही फिर से or it again)
अज: (जन्म रहित unborn) नित्यः (निरंतर रहने वाला eternal) शाश्वत: अयम् (यह शाश्वत है this is permanent) पुराण: (अनादि है oldest)न हन्यते (नहीं मारा जाता never killed)हन्यमाने शरीरे (शरीर के मरने पर भी upon killing the body)
 
यह आत्मा किसी काल में भी मैं न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है; क्योंकि यह अजन्मा, नित्य सनातन और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
 
This Self is never born nor does it perish; nor having come into existence will it again cease to be. It's birthless, eternal, changeless, ever same. It's not slain when body is killed.
 
शरीर में छह विकार होते हैं: उत्पन्न होना, समर्थ दिखना, बदलना, बढ़ना, घटना और नष्ट होना
इनमें से दो विकार मुख्य हैं जन्मना और मरना। अर्जुन को अच्छी तरह से समझाने के लिए भगवान ने इनका दो-दो बार निषेध किया है पहले न जायते' कहा और दूसरी बार अज: भी कह दिया। फिर इसको म्रियते कहा और इसके बाद 'न  हन्यते हन्यमाने शरीरे' कहा। परंतु यह परिवर्तन केवल शरीर में होते हैं आत्मा में नहीं । आधी उम्र बीतने के बाद शरीर घटने लगता है लेकिन शरीरी में यह क्षय नहीं होता। 
हमारे शरीर के विभिन्न अंग है जैसे आंख, नाक, हाथ, पैर आदि । ये अपनी जगह स्थिर रहते हैं परंतु शरीर से बहने वाली चीजें जैसे मल-मूत्र, कफ, फोड़ा फुंसी आदि हमारे अंग नहीं है। इसी तरह आत्मा की तुलना में शरीर भी प्रवाहमान है वह प्रतिक्षण मृत्यु की ओर जा रहा  है इसलिए वह आत्मा का अंग नहीं है।
 
 आत्मा शरीर के साथ चिपकी हुई नहीं है बल्कि शरीर आत्मा से चिपका हुआ है और वह धीरे-धीरे क्षीण होकर एक दिन छूट जाता है । शरीर के तीन प्रकार होते हैं भौतिक शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। भौतिक शरीर पांच महा भूतों की सहायता से धरती से लिए गए भोजन से धीरे-धीरे बनता है। जाने से पहले धरती उसे वापस ले लेती है लेकिन सूक्ष्म शरीर; कर्म, संस्कार और प्रारब्ध के साथ नया जीवन प्राप्त करता है, और कारण शरीर अपने मूल स्रोत परमात्मा में विलीन हो जाता है।

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